Friday, October 26, 2007

कर ज़िंदगी मे ऐसे कुछ तू, के रह जाए दंग हर कोई |

कर ज़िंदगी मे एस कुछ तू
के रह जाए दंग हर कोई

अब हटा वह हर कोई
जो सामने तेरे आए या टोक

रुकते है बस वह जो है
ज़िंदगी से थके हरे हुए

इस ज़माने कि तोह अब
आंखें भी तू, जुर्रत भी तू

अब कर ज़िंदगी मे ऐसे कुछ तू
के रह जाए दंग हर कोई

By Arun Raj
26/10/07

1 comment:

Priy said...

कर ज़िंदगी मे ऐसे* कुछ तू, ((aisa))
के रह जाए दंग हर कोई

"कर बदल वह हर कोई
जो सामने तेरे आए या ठोक"

Didn't get these lines.. I hope you won't mind demystifying them..

इस ज़माने की है तू अब,
आंखें और जुर्रत भी तू

Lovely expressions :)

I believe the lines could rhyme better this way:
'is zamane ki toh ab,
aankhe bhi tu, jurrat bhi tu'

I liked the basic theme of the poem. Specially the lines on self believe & daring attitute.. Keep penning...